क्या था ऑपरेशन गुलमर्ग? कैसे वही मंसूबे 73 साल बाद भी पाले है पाकिस्तान


अंग्रेज़ों से आज़ादी (India Freedom) मिली तो भारत और पाकिस्तान बंटवारा (Indo-Pak Division) हुआ और एक कभी न खत्म होने वाली दुश्मनी का सिलसिला शुरू हुआ. आज़ादी तो मिली थी, लेकिन कश्मीर का किस्सा (Kashmir Difficulty) उलझ गया था. इस प्रांत को पूरी तरह हथियाने के लिए 1947 में ही आज़ादी के फ़ौरन बाद पाकिस्तान ने यहां कबाइलियों के ज़रिये जो हमला (Pakistan Attacked Kashmir) करवाया था, उसे इतिहास में ऑपरेशन गुलमर्ग के नाम से जाना जाता है. भारतीय सेना (Indian Army) के सूत्रों के हवाले से जो कहानी बताई जाती है, पहले वो जानिए, उसके बाद इसके ताज़ा संस्करण की चर्चा करेंगे.

क्या था ऑपरेशन गुलमर्ग?
पाकिस्तान अलग मुल्क बना और एक ही हफ्ते के अंदर 20 अगस्त 1947 को उसने साज़िश रची. इत्तेफाक़ से इस साज़िश की भनक बन्नू ब्रिगेड के मेजन ओएस कालकट को लग गई. साज़िश ये थी कि पश्तो कबाइलियों के कम से कम 20 लश्कर बन्नू, वाना, पेशावर, कोहट, थल और नौशेरा पहुचेंगे, जहां उन्हें हथियारों की कमी नहीं होने दी जाएगी. सितंबर के पहले हफ्ते में ही इन लश्करों को यहां से रवाना होना था.

ये भी पढ़ें :- कैसी है साइकोलॉजिकल ट्रेनिंग, क्यों कश्मीर में आर्मी को दी जा रही हैइन लश्करों को 18 अक्टूबर को एबटाबाद पहुंचकर 22 अक्टूबर तक जम्मू और कश्मीर में हमला बोलना था. साज़िश के मुताबिक 10 लश्करों का काम था कि वो कश्मीर घाटी में हाहाकार मचाएं और बाकी पुंछ, भीमबर और रावलकोट पहुंचकर विद्रोहियों के संगठनों के साथ मिलकर जम्मू की तरफ कूच करें. पाकिस्तान की सेना गुपचुप ढंग से उनके लिए हर तरह की व्यवस्था कर रही थी.

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भारत पाकिस्तान संघर्ष की दास्तान

इस साज़िश के मुताबिक हमला हुआ. कबाइलियों ने भारी लूटपाट, मारकाट और अत्याचारों को अंजाम देकर तकरीबन 35 से 40 हज़ार हत्याएं की थीं और भारतीय सेना ने किसी तरह इस हमले का सामना कर जम्मू व कश्मीर की हिफाज़त की थी. विद्वान मानते हैं कि इसी तरह घटना हुई थी. डेरा इस्माइल खान के कमिश्नर ने भी इस तरह की साज़िश होने की बात कही थी.

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हालांकि पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर हमेशा ऑपरेशन गुलमर्ग से इनकार किया लेकिन अमेरिका बेस्ड राजनीतिक और कूटनीतिक विश्लेषक शुजा नवाज़ ने 22 पश्तों कबाइलियों की सूची जारी कर बताया कि 22 अक्टूबर 47 को कश्मीर पर हमला और घुसपैठ किस तरह की गई थी. ऑपरेशन गुलमर्ग के कारणों और उन फैक्टरों पर एक नज़र डालिए, जिससे इतना घातक हमला हो पाया.

* कबाइली हमले का मकसद था श्रीनगर एयरपोर्ट पर कब्ज़ा करना और बनिथाल पास तक बढ़ जाना.
* 22 अक्टूबर की तय तारीख पर जम्मू कश्मीर की सीमाओं में घुसपैठ कर भारी आतंक मचाने की साज़िश थी.
* चूंकि उस वक्त जम्मू कश्मीर में भारतीय सेनाएं पूरी तरह तैनात नहीं थीं इसलिए बड़े हमले का सामना करने की तैयारी नहीं थी.
* भारत इस हमले को रोकने और सामना करने में शुरूआती तौर पर नाकाम रहा क्योंकि अव्वल तो सितंबर 47 में जो हमला हुआ, उसे लेकर गंभीरता नहीं बरती गई और फिर कम्युनिकेशन सिस्टम और सेना के लिए दिल्ली से कश्मीर तक पहुंचना काफी मुश्किल काम रहा था.

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अब जानिए कि अचानक ऑपरेशन गुलमर्ग के बारे में चर्चा क्यों होने लगी? अस्ल में, हाल में एक यूरोपीय थिंक टैंक ने साफ कहा है कि ऑपरेशन गुलमर्ग के 73 साल बाद भी जम्मू कश्मीर को हथियाने के पाकिस्तान के मंसूबे कायम हैं और उसी तरह की हरकतों से वो बाज़ नहीं आ रहा है. इस थिंक टैंक से जुड़ी खास बातें भी जानें.

पाक के नापाक मंसूबे!
यूरोपीय फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज (EFSAS) ने कबाइलियों के हमले को लेकर कहा कि ‘वो कश्मीरी पहचान मिटाने के लिए पहला और घातक कदम था. वो पाक सेना का मेजर जनरल अकबर खान था, जिसने जम्मू-कश्मीर पर हमले के लिए 22 अक्टूबर 1947 की तारीख तय की थी. पाक ने ही रात में लड़ाकों को बसों और ट्रकों में भरकर भारतीय सीमा तक पहुंचाया था.’

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पाकिस्तान ने शुरू से ही आतंक की राह अपनाई.

ताज़ा व्याख्या में EFSAS ने कहा है कि कश्मीर घाटी में जो लोग पाकिस्तानी प्रोपैगेंडा और प्रांत में मुस्लिमों की स्थिति को लेकर चिंता जता रहे हैं, उन्हें अक्टूबर 1947 की पाक की उस नापाक नीति को नहीं भूलना चाहिए. पाकिस्तान ने तब भी इसे कबाइलियों का ‘जिहाद’ बताया था, लेकिन यह झूठ तब भी पकड़ा गया था और आतंक का मतलब आतंक ही समझा गया था.





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